जब मददगार ही पीठ फेर ले, तो सवाल खुद-ब-खुद उठते हैं
News Desk Patna:
जिस अमेरिका को पाकिस्तान दशकों तक अपनी लाइफलाइन कहता रहा,
जिसके डॉलर पर उसकी अर्थव्यवस्था सांस लेती रही,
जिसकी सैन्य और कूटनीतिक मदद से उसकी सत्ता संरचनाएं टिकी रहीं —
आज वही अमेरिका पाकिस्तान को स्थायी वीज़ा देने से इनकार कर रहा है।
यह फैसला सिर्फ एक इमिग्रेशन पॉलिसी नहीं है।
यह अविश्वास का सार्वजनिक ऐलान है।
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा पाकिस्तानी नागरिकों के लिए अमेरिकी इमिग्रेंट वीज़ा प्रक्रिया पर लगाई गई रोक दरअसल उस रिश्ते का अंत है, जो कागज़ों पर दोस्ती कहलाता था, लेकिन ज़मीन पर हमेशा संदेह से भरा रहा।
वीज़ा रोक: एक तकनीकी फैसला या राजनीतिक संदेश?
आधिकारिक तौर पर अमेरिका कहता है कि यह कदम “राष्ट्रीय सुरक्षा”, “बैकग्राउंड वेरिफिकेशन” और “आर्थिक आत्मनिर्भरता” जैसे कारणों से उठाया गया है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फैसले सिर्फ फाइलों से नहीं, इतिहास से भी निकलते हैं।
और पाकिस्तान का इतिहास अमेरिका के साथ हमेशा दोहरेपन से भरा रहा है।
एक तरफ़ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी का दावा,
दूसरी तरफ़ उन्हीं नेटवर्क्स को पनाह, जिन पर पूरी दुनिया उंगली उठाती रही।
एक तरफ़ मदद की गुहार,
दूसरी तरफ़ भरोसे का लगातार क्षरण।
आज उसी इतिहास का परिणाम है कि पाकिस्तान उन देशों की सूची में खड़ा है, जिन्हें अमेरिका अब हाई रिस्क मानता है।
पाकिस्तान: हमेशा सहयोगी, लेकिन कभी भरोसेमंद नहीं
पाकिस्तान ने वर्षों तक खुद को अमेरिका का फ्रंटलाइन एलाय बताया।
सोवियत युद्ध से लेकर वॉर ऑन टेरर तक, पाकिस्तान ने हर बार यही तर्क दिया कि वह अमेरिका के लिए “अनिवार्य” है।
लेकिन हर दौर के बाद एक सवाल और गहरा होता गया —
क्या पाकिस्तान सच में सहयोगी है, या सिर्फ मजबूरियों का सौदागर?
अमेरिका ने अरबों डॉलर की मदद दी,
लेकिन बदले में उसे पारदर्शिता नहीं मिली।
साझेदारी मांगी,
लेकिन भरोसा नहीं मिला।
और अब नतीजा सामने है।
वीज़ा रोक का असली मतलब
इमिग्रेंट वीज़ा रोकना कोई छोटा फैसला नहीं होता।
यह सीधे-सीधे कहता है कि अमेरिका अब पाकिस्तान से आने वाले लोगों को
अपने सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा ढांचे के लिए जोखिम मानता है।
ग्रीन कार्ड, फैमिली सेटलमेंट और स्थायी निवास —
ये सिर्फ दस्तावेज़ नहीं होते,
ये विश्वास की मोहर होते हैं।
और पाकिस्तान के मामले में यह मोहर अब गायब है।
भारत क्यों अलग खड़ा है?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि भारत इस सूची में नहीं है।
भारतीय नागरिकों के लिए इमिग्रेंट वीज़ा प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगी।
यह अंतर संयोग नहीं है।
भारत ने आतंकवाद पर अस्पष्ट भाषा नहीं,
बल्कि स्पष्ट नीति अपनाई।
दुनिया से सहानुभूति नहीं मांगी,
बल्कि सबूत रखे।
भारत ने वैश्विक नियमों का पालन किया,
संस्थागत भरोसा बनाया
और खुद को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित किया।
यही वजह है कि आज अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार मानता है,
और पाकिस्तान को सुरक्षा जोखिम।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: सवालों से बचने की कोशिश
इस्लामाबाद ने इस फैसले को भेदभावपूर्ण बताया है।
लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में यह नया नहीं है।
हर अंतरराष्ट्रीय दबाव को
“अन्याय” कहकर टाल देना,
और हर सवाल को
“राजनीतिक साजिश” बताना —
यह रवैया ही उसकी सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।
अगर सब कुछ ठीक होता,
तो अमेरिका जैसा देश,
जो अपने हितों से ऊपर कुछ नहीं रखता,
इतना सख़्त कदम क्यों उठाता?
यह फैसला सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं
अमेरिका का यह कदम एक व्यापक संकेत है।
यह बताता है कि आने वाले समय में
दुनिया भावनाओं पर नहीं,
विश्वसनीयता पर चलेगी।
जो देश दोहरा खेल खेलेगा,
उसे सिर्फ बयानबाज़ी से नहीं,
नीतिगत फैसलों से जवाब मिलेगा।
आज यह वीज़ा रोक है,
कल यह आर्थिक दबाव हो सकता है,
और परसों कूटनीतिक अलगाव।
अंत में सवाल सिर्फ पाकिस्तान से नहीं
यह कहानी सिर्फ पाकिस्तान की नहीं है।
यह उन सभी देशों के लिए चेतावनी है
जो वैश्विक मंच पर
जिम्मेदारी से ज़्यादा चालाकी को तरजीह देते हैं।
दुनिया अब बदल चुकी है।
अब सहानुभूति नहीं बिकती,
भरोसा बिकता है।
और भरोसा वही देश कमाते हैं
जो नीति और व्यवहार में एक जैसे होते हैं।
भारत आज उसी रास्ते पर खड़ा है —
स्थिर, भरोसेमंद और आत्मविश्वासी।
जबकि पाकिस्तान,
जिसे कभी अमेरिका की लाइफलाइन कहा जाता था,
आज उसी अमेरिका के दरवाज़े पर
वीज़ा के लिए खड़ा है।
और शायद यही अंतर
आज की वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई है।


















